आरक्षण सिर्फ आरंभिक १० वर्ष के लिए लगाया गया था | इसे बढाते गए फिर अटल जी ने इसे और बढ़ा दिया | अब चर्चा का विषय ये है की आरक्षण कब तक देंगे अगले 50 वर्ष या 100 वर्ष या अनिश्चित काल तक जब तक की सारे सवर्ण दलित न हो जाए तब तक या सारे दलित सवर्ण न हो जाए तब तक | पर उसके लिए भी समीक्षा तो करनी होगी जाच समिति बना कर ये रिपोर्ट तो लेनी ही होगी की पिछले लगभग 7 दशको में आरक्षण से कितना लाभ हुआ | यदि आरक्षण से लाभ हो रहा है तो ठीक है एक समय सीमा आजायेगी की कितने वर्षो में सभी दलित सवर्ण हो जायेंगे | यदि नही हो रहा तो इसे तत्काल प्रभाव से समाप्त करना चाहिए | पर यहाँ तो चर्चा ही नही करना चाहते कोई |
सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण अभी कोई मुद्दा नहीं है | उनके लिए भी नही जो कही अधिक नम्बर लाने के उपरान्त भी भटक रहे और उनकी नियुक्ति नहीं हुई |
जब आप आरक्षण का के विरोध की कोई बात करते है तो उनके समर्थन करने वाले आजाते है | उनमे से अधिकतर ऐसे होंगे जो कही न कही नौकरी कर रहे होंगे | कारण ये है की उन्हें तो अपने बच्चो के लिए भी आरक्षण चाहिए | पर उनके विरोध में प्रमुख बात होगी की हमारा अपमान हुआ |
ऐसे प्रश्नों पर मैं अक्सर पूछता हूँ की अपमान के बदले नौकरी पाना ये महंगा सौदा नहीं है ? अपमान यदि जन्मगत जाती से हुआ तो नौकरी उस दशा को बदल तो नही देगी | हां नौकरी आर्थिक दशा अवश्य बदल देगी | और आर्थिक दशा बदलने को नौकरी है तो हर वो व्यक्ति जिसकी आर्थिक दशा खराब हो उसे नौकरी मिलनी चाहिए | फिर प्रश्न ये उठता है की सरकारी नौकरी में आरक्षण आर्थिक आधार पर किआ जाए | पर फिर भी वही समस्या होगी | अयोग्य को पदासीन कर रहे चाहे वो किसी भी जाती का हो | इसलिए आरक्षण तो ऐसे होना भी अन्याय ही है योग्यता के साथ और पद के साथ |
सामाजिक बराबरी के लिए आरक्षण लाये तो वो तो आने से रही क्यों की आरक्षण से जातिवाद बढ़ा है और जातिवाद और बढेगा फिर जातिवाद का रोना आरक्षण का लाभ लेने वाले ही रोते है |
फिर जो रोना ये रोते है की हमारा शोषण हुआ तो क्या उची जाती के दलितों ने नीची जाती के दलितों के साथ भेद भाव और अन्याय नहीं किआ ? आरक्षण में आरक्षण भला क्यों नहीं होना चाहिए ?
सवर्ण केवल ये नही कह सकते की आरक्षण समाप्त करो
जी इस बात से मैं भी सहमत हूँ | सामाजिक बराबरी का अधिकार सभी को मिलना ही चाहिए | लोगो को उनके जन्म के अनुसार दबाया जाना उचित नहीं है | उनपर जातिगत टिप्पणी भी अनुचित है | कानूनों का दुर्पयोग भी अनुचित है | न्यायसंगत व्यवस्था का सृजन करना ही हमारा ध्येय होना चाहिए | कई विकल्प किए जा सकते है इसके लिए हमारी इच्छा और हमारी इच्छा शक्ति हो परिवर्तन की | दिल से हम ये चाहे की पीछे के लोग भी आगे आये और वे जो पीछे है वो भी अपने पीछे लोगो को आगे लाये | पर हम सहयोग की नहीं (co-operation) हम तो प्रतियोगिता (competition) की व्यवस्था चला रहे है ऐसे में ऐसे भाव कैसे आयेंगे | एक दुसरे को दबाने और दबाये रखने के भाव कैसे समाप्त होंगे | हमें ये स्वीकार करना होगा की लोगो का अपमान उनकी आर्थिक स्तिथि की वजह से होता है अतः हमें पुरे समाज को समृद्ध करने की भावना लानी होगी | और ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जहा सबको समान अवसर मिले और योग्यता का हनन न हो | जी हां ऐसा बिलकुल संभव है |
लेख को बिना लम्बा खीचे हम कुछ उपाय लिख रहे है अन्य सुझाव भी आमंत्रित है :-
१. हाई स्कुल से लेकर सरकारी विभागों में उपनाम लिखने की व्यवस्था समाप्त कर दी जाए | ऐसे में लोग सामाजिक तौर पर तो स्वतंत्र होंगे अपनी जाती बताने को पर सरकार कम से कम बढ़ावा नही देगी | वो देगी तो कर्म अनुसार बनाई जाती को | जन्मना व्यवस्था को समाज ने बनाया है और जब तक समाज चाहेगा उसे रखेगा सरकार के इस कदम से समाज में भी वर्तमान आवयश्कताओ के प्रति जागरूकता आएगी | पर ऐसा तब ही हो जब आरक्षण समाप्त कर दिया जाए |
2. जो पिछड़े है गाँवों से है सही शिक्षा नहीं मिल पाई है आर्थिक रूप में समृद्ध नहीं है उनको निशुक्ल कोचिंग दिलवाई जाए किताबे दिलवाई जाए और ऐसा सभी जातियों के लिए हमेशा किआ जा सकता है | कमजोरो के अधिकारों की रक्षा करना ही सरकार का कर्तव्य है |
3. जो बहुत पिछड़े है उन्हें आर्थिक सहायता दी जाए उनको जीवन में कोचिंग तक मुफ्त सहायता लेने में भी समय लग जाएगा | उन्हें उनकी योग्यता अनुसार कोई रोजगार कराया जाए या नियुक्त किआ जाए क्षेत्रिय स्तर पर बिना प्रतियोगिता वाले पदों पर |
समाज और सरकार चाहे तो मिल बैठ कर एक अच्छा विकल्प निकाल सकती है | जैसे चल रहा है वैसे तो सामाजिक वैमनस्य का बीज बड़ा विष वृक्ष बन जाएगा और आगे चल कर देश को विभाजित करने की स्तिथि ले आएगा | उन परिस्थितयो को ध्यान में रखते हुए हमें प्रयास करना होगा | ऐसे दसियों विकल्प है जो आरक्षण के विकल्प को प्रतिस्थापित कर सकते है | दोनों पक्षों को बैठ कर बात करने के लिए तैयार होना चाहिए | दलित स्वीकार करे की आरक्षण योग्यता का हनन है और सवर्ण स्वीकार करे की दलितों को बराबरी का पूरा अधिकार है और ये उनका कर्तव्य है की वे उन्हें आगे लाये | देखिये कैसे भारत समृद्ध होता है |
सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण अभी कोई मुद्दा नहीं है | उनके लिए भी नही जो कही अधिक नम्बर लाने के उपरान्त भी भटक रहे और उनकी नियुक्ति नहीं हुई |
जब आप आरक्षण का के विरोध की कोई बात करते है तो उनके समर्थन करने वाले आजाते है | उनमे से अधिकतर ऐसे होंगे जो कही न कही नौकरी कर रहे होंगे | कारण ये है की उन्हें तो अपने बच्चो के लिए भी आरक्षण चाहिए | पर उनके विरोध में प्रमुख बात होगी की हमारा अपमान हुआ |
ऐसे प्रश्नों पर मैं अक्सर पूछता हूँ की अपमान के बदले नौकरी पाना ये महंगा सौदा नहीं है ? अपमान यदि जन्मगत जाती से हुआ तो नौकरी उस दशा को बदल तो नही देगी | हां नौकरी आर्थिक दशा अवश्य बदल देगी | और आर्थिक दशा बदलने को नौकरी है तो हर वो व्यक्ति जिसकी आर्थिक दशा खराब हो उसे नौकरी मिलनी चाहिए | फिर प्रश्न ये उठता है की सरकारी नौकरी में आरक्षण आर्थिक आधार पर किआ जाए | पर फिर भी वही समस्या होगी | अयोग्य को पदासीन कर रहे चाहे वो किसी भी जाती का हो | इसलिए आरक्षण तो ऐसे होना भी अन्याय ही है योग्यता के साथ और पद के साथ |
सामाजिक बराबरी के लिए आरक्षण लाये तो वो तो आने से रही क्यों की आरक्षण से जातिवाद बढ़ा है और जातिवाद और बढेगा फिर जातिवाद का रोना आरक्षण का लाभ लेने वाले ही रोते है |
फिर जो रोना ये रोते है की हमारा शोषण हुआ तो क्या उची जाती के दलितों ने नीची जाती के दलितों के साथ भेद भाव और अन्याय नहीं किआ ? आरक्षण में आरक्षण भला क्यों नहीं होना चाहिए ?
सवर्ण केवल ये नही कह सकते की आरक्षण समाप्त करो
जी इस बात से मैं भी सहमत हूँ | सामाजिक बराबरी का अधिकार सभी को मिलना ही चाहिए | लोगो को उनके जन्म के अनुसार दबाया जाना उचित नहीं है | उनपर जातिगत टिप्पणी भी अनुचित है | कानूनों का दुर्पयोग भी अनुचित है | न्यायसंगत व्यवस्था का सृजन करना ही हमारा ध्येय होना चाहिए | कई विकल्प किए जा सकते है इसके लिए हमारी इच्छा और हमारी इच्छा शक्ति हो परिवर्तन की | दिल से हम ये चाहे की पीछे के लोग भी आगे आये और वे जो पीछे है वो भी अपने पीछे लोगो को आगे लाये | पर हम सहयोग की नहीं (co-operation) हम तो प्रतियोगिता (competition) की व्यवस्था चला रहे है ऐसे में ऐसे भाव कैसे आयेंगे | एक दुसरे को दबाने और दबाये रखने के भाव कैसे समाप्त होंगे | हमें ये स्वीकार करना होगा की लोगो का अपमान उनकी आर्थिक स्तिथि की वजह से होता है अतः हमें पुरे समाज को समृद्ध करने की भावना लानी होगी | और ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जहा सबको समान अवसर मिले और योग्यता का हनन न हो | जी हां ऐसा बिलकुल संभव है |
लेख को बिना लम्बा खीचे हम कुछ उपाय लिख रहे है अन्य सुझाव भी आमंत्रित है :-
१. हाई स्कुल से लेकर सरकारी विभागों में उपनाम लिखने की व्यवस्था समाप्त कर दी जाए | ऐसे में लोग सामाजिक तौर पर तो स्वतंत्र होंगे अपनी जाती बताने को पर सरकार कम से कम बढ़ावा नही देगी | वो देगी तो कर्म अनुसार बनाई जाती को | जन्मना व्यवस्था को समाज ने बनाया है और जब तक समाज चाहेगा उसे रखेगा सरकार के इस कदम से समाज में भी वर्तमान आवयश्कताओ के प्रति जागरूकता आएगी | पर ऐसा तब ही हो जब आरक्षण समाप्त कर दिया जाए |
2. जो पिछड़े है गाँवों से है सही शिक्षा नहीं मिल पाई है आर्थिक रूप में समृद्ध नहीं है उनको निशुक्ल कोचिंग दिलवाई जाए किताबे दिलवाई जाए और ऐसा सभी जातियों के लिए हमेशा किआ जा सकता है | कमजोरो के अधिकारों की रक्षा करना ही सरकार का कर्तव्य है |
3. जो बहुत पिछड़े है उन्हें आर्थिक सहायता दी जाए उनको जीवन में कोचिंग तक मुफ्त सहायता लेने में भी समय लग जाएगा | उन्हें उनकी योग्यता अनुसार कोई रोजगार कराया जाए या नियुक्त किआ जाए क्षेत्रिय स्तर पर बिना प्रतियोगिता वाले पदों पर |
समाज और सरकार चाहे तो मिल बैठ कर एक अच्छा विकल्प निकाल सकती है | जैसे चल रहा है वैसे तो सामाजिक वैमनस्य का बीज बड़ा विष वृक्ष बन जाएगा और आगे चल कर देश को विभाजित करने की स्तिथि ले आएगा | उन परिस्थितयो को ध्यान में रखते हुए हमें प्रयास करना होगा | ऐसे दसियों विकल्प है जो आरक्षण के विकल्प को प्रतिस्थापित कर सकते है | दोनों पक्षों को बैठ कर बात करने के लिए तैयार होना चाहिए | दलित स्वीकार करे की आरक्षण योग्यता का हनन है और सवर्ण स्वीकार करे की दलितों को बराबरी का पूरा अधिकार है और ये उनका कर्तव्य है की वे उन्हें आगे लाये | देखिये कैसे भारत समृद्ध होता है |
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