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Tuesday, 11 April 2017

संघठन सूक्त

ओ३म्सं समिधवसे वृषन्नग्ने विश्वान्यर्य |
इड़स्पदे समिधुवसे नो वसुन्या भर                            |
         हे प्रभो ! तुम शक्तिशाली हो बनाते सृष्टि को ||
        
वेद सब गाते तुम्हें हैं कीजिए धन वृष्टि को ||
ओ३म सगंच्छध्वं सं वदध्वम् सं वो मनांसि जानतामं | 
देवा भागं यथा पूर्वे सं जानानां उपासते               |
       प्रेम से मिल कर चलो बोलो सभी ज्ञानी बनो | 
      
पूर्वजों की भांति तुम कर्त्तव्य के मानी बनो ||
समानो मन्त्र:समिति समानी समानं मन: सह चित्त्मेषाम् |
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये : समानेन वो हविषा जुहोमि    ||
      हों विचार समान सब के चित्त मन सब एक हों |
    
ज्ञान देता हूँ बराबर भोग्य पा सब नेक हो ||
ओ३म समानी आकूति: समाना ह्र्दयानी : |
समानमस्तु वो मनो यथा : सुसहासति             ||
     हों सभी के मन तथा संकल्प अविरोधी सदा |
   
मन भरे हो प्रेम से जिससे बढे सुख सम्पदा ||



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