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Monday, 1 August 2016

महामृत्युंजय मंत्र का रहस्य

त्रयम्बकं यजामहे सुघंधिम पुष्टिवर्धनम , उर्वारुकमिव बंधत मृत्योमोक्षीय माँ मामृतात |
अज्ञानी पुरुष मृतुन्जय मंत्र में प्रयुक्त त्रयम्बकं को तीन नेत्र समझते है |
वेद में अम्ब को दावा कहा गया है |
"शतं वो अम्ब धामानि ...इमं में अगदम कृत "
अर्थार्था हे अम्ब |मुझे आरोग्य कीजिये | यहाँ रोगी आरोग्य होने के लिए कहता है |

दूसरी जगह उक्त तीन अम्बाओ का होम करना लिखा गया है
सहा स्वस्त्रामबिकया तं जुषस्व | यजु o | ५७


इस से स्पष्ट कहा गया है की अम्बिका की बहेनो के साथ हवन करो|
यजुर्वेद |६० कहता है "त्रयम्बकं यजामहे सुघंधिम पुष्टिवर्धनम"
यजुर्वेद स्पष्ट करता है ये तीन ओषदिया है
आंबे अम्बिकेअम्बालिके माँ नयति कश्चन|
सस्स्सत्याशावाकाह सुभ्द्रिकाम कम्पिल्वासिनिम|| यजुर्वेद २३||१८

उक्त तीनो एक ही स्थान पर कहे दिए गए है |
प्रमाण पाणिनि का त्रयम्बक पद सूत्र अष्टाध्यायी ||५८


ये औषधीय कम्पिल में होती है | काम्पिल से महाभारत का कुछ समबन्ध नहीं था |
वे काशी नरेश की कन्याये थी और हस्तिनापुर में ब्याह कर आई थी, अतः यह फरुखाबाद वाला कम्पिला नहीं है |
काम्पिल नाम एक ओषधि का है , जिसके साथ ही अम्बिका आदि ओषधि उगती है |
वैदिक शाश्त्र में भी इसका प्रमाण मिलता है
माचिका प्रष्ठिकम्बष्ठ तथाम्बाम्बिकाम्बालिका| भाव o हरित्क्यदिवार्गा १७०
अतः उक्त प्रमाणों से सिद्ध हो गया की तीन अम्बा ना शिव के तीन नेत्र है ना ही महाभारत कालीन कन्याये और रानियो की चर्चाये है |
यह लेख वैदिक समाप्ति पंडित रघुनन्दन शर्मा साहित्यभूषण द्वारा लिखित पुस्तक की सहायता से लिखा गया है |

मन्त्र में मात्राओं का दोष मूल सहिंता से मिला ले 

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